Safarnama 2018: सुप्रीम कोर्ट ने लिए ये बड़े फैसले- कुछ का हुआ स्वागत, कुछ पर अब भी विवादMonday, December 31, 2018-11:04 PM
  • नई दिल्ली/हुमरा असद। अगला साल यानि 2019 दस्तक दे रही है और 2018 अलविदा कहने को तैयार है। इस साल के शुरुआत से लेकर अंत तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई अहं फैसले दिए गए हैं। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने मामलों पर ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं। आइये इन पर एक नजर डालते हैं...

    धारा 377 - समलैंगिकता अब अपराध नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले को लेकर मानसिकता बदलने की जरूरत है। कोई भी शख्‍स अपने व्यक्तित्व से बच नहीं सकता। सीजेआई ने कहा- जैसा मैं हूं उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समलैंगिकता को एलजीबीटी क्यू के रूप में जाना जाता है। जिसमें L-लेस्बियन, G-गे,B-बी-बाईसेक्सुअल और T-ट्रांसजेंडर, Q-क्व‍ियर। इसे क्व‍ियर समुदाय का नाम भी दिया गया है।

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    ये धारा अप्रकृतिक यौन संबंधों को गैरकानूनी ठहराती है। इस धारा को ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों द्वारा 1862 में लागू किया था। सेक्शन 377 के तहत  अगर कोई स्‍त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। किसी जानवर के साथ संबंध बनाने पर इस कानून के तहत उम्रकैद या 10 साल की सजा एवं जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून के तहत गिरफ्तारी के लिए किसी वारंट की जरूरत नहीं होती। शक के अधार पर या गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है।

    धारा 497- एडल्टरी कानून

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में व्यभिचार से संबंधित दंडात्मक प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह स्पष्ट रूप से मनमाना है और महिला की वैयक्तिकता को ठेस पहुंचाता है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया।

    भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुए भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा। इस अपराध के लिए पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था।

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    दिल्ली का बॉस कौन? सरकार या उपराज्यपाल

    दिल्ली की आप सरकार और उपराज्यपाल के बीच लंबे वक्त से चल रही जंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है। फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल को कैबिनेट के साथ चलने और दिल्ली सरकार द्वारा राज्यों के चलाए जाने की बात कही। साथ ही कोर्ट की तरफ से यह भी कहा गया कि सरकार को कानून बनाने का अधिकार है।

    आधार कार्ड लिंक

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केन्द्र की महत्वाकांक्षी योजना आधार को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया लेकिन उसने बैंक खाते, मोबाइल फोन और स्कूल दाखिले में आधार अनिवार्य करने सहित कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया। पूर्व प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने फैसले में आधार को आयकर रिटर्न भरने और पैन कार्ड बनाने के लिए अनिवार्य बताया।

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    हालांकि अब आधार कार्ड को बैंक खाते से लिंक करना जरूरी नहीं है और मोबाइल फोन का कनेक्शन देने के लिए टेलीकॉम कंपनियां आपसे आधार नहीं मांग सकती हैं। न्यायालय ने कहा कि सीबीएसई, नीट, यूजीसी आधार को अनिवार्य नहीं कर सकते हैं और स्कूलों में दाखिले के लिए भी यह अनिवार्य नहीं है। पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वह अवैध आव्रजकों को आधार नंबर नहीं दे।

    सबरीमाला मंदिर

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के माध्यम से केरल के सबरीमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की रास्ता साफ कर दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश से रोकना लैंगिक आधार पर भेदभाव है और यह परिपाटी हिन्दू महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि धर्म मूलत: जीवन शैली है जो जिंदगी को ईश्वर से मिलाती है। न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन और न्यायमूर्ति डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने प्रधान न्यायाधीश तथा न्यायमूर्ति ए. एम.खानविलकर के फैसले से सहमति व्यक्त की जबकि न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा का फैसला बहुमत के विपरीत है।

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    संविधान पीठ में एक मात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने कहा कि देश में पंथनिरपेक्ष माहौल बनाये रखने के लिये गहराई तक धार्मिक आस्थाओं से जुड़े विषयों के साथ छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अभी तक भी 50 साल से कम उम्र की महिला प्रवेश नहीं कर पाई है, इस पर स्थानीय लोगों का लगातार विरोध जारी है।

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